
बदलता छत्तीसगढ़।रायगढ
कुछ लोग इस दुनिया में बहुत कम समय के लिए आते हैं, लेकिन अपने कर्मों से ऐसी अमिट छाप छोड़ जाते हैं, जिसे वक्त भी कभी मिटा नहीं पाता। कुछ नाम केवल व्यक्ति की पहचान नहीं होते, बल्कि एक विचार, एक संघर्ष और एक पूरे समाज के स्वाभिमान का प्रतीक बन जाते हैं। ऐसे ही एक शख्सियत थे गोपाल कृष्ण नायक, जिन्हें पूरा अंचल प्यार और सम्मान से 'देहाती' के नाम से जानता था।
'देहाती'... यह महज एक उपनाम नहीं था, बल्कि उनके आत्मसम्मान, संघर्ष और स्वाभिमान की एक बुलंद आवाज थी।
दरअसल, शहरी पत्रकारिता के गलियारों में ग्रामीण अंचल से आने वाले पत्रकारों को अक्सर 'देहाती' कहकर संबोधित किया जाता था। इस संबोधन में कहीं न कहीं उनके ग्रामीण परिवेश और उनकी पहचान का उपहास छिपा होता था। लेकिन गोपाल कृष्ण नायक ने इस उपेक्षा को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने उसी शब्द को अपनी पहचान बना लिया, जिसे कभी उनकी और ग्रामीण पत्रकारों की हंसी उड़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
उन्होंने साबित कर दिया कि पत्रकारिता की असली ताकत बड़े शहरों के दफ्तरों, चमक-दमक और संसाधनों में नहीं, बल्कि कलम की धार, विचारों की स्पष्टता और सच के प्रति अटूट प्रतिबद्धता में होती है।
गोपाल कृष्ण नायक ने अपने नाम के आगे 'देहाती' लगाकर सिर्फ अपनी पहचान नहीं बनाई, बल्कि खरसिया सहित पूरे अंचल के ग्रामीण पत्रकारों को एक नया आत्मविश्वास दिया। उन्होंने यह संदेश दिया कि गांव की मिट्टी से जुड़ा होना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
उनका संघर्ष केवल व्यक्तिगत पहचान बनाने तक सीमित नहीं था। बेहद कम समय में उन्होंने अपनी कलम की ताकत से सत्ता के गलियारों से लेकर विपक्ष और समाज के अंतिम व्यक्ति तक अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। उनकी पत्रकारिता में मेहनत थी, समर्पण था और सबसे बढ़कर आम आदमी की आवाज बनने का जज्बा था।
उनकी लेखनी ने उन मुद्दों को भी आवाज दी, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता था। सत्ता से सवाल पूछने का साहस हो या आम लोगों की पीड़ा को सामने लाने की जिम्मेदारी, गोपाल ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से अपनी एक अलग पहचान बनाई।
आज नियति के क्रूर प्रहार ने हमसे उस शख्स को छीन लिया है, जिसने ग्रामीण पत्रकारिता को एक नई पहचान देने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके जाने से सिर्फ एक पत्रकार का निधन नहीं हुआ, बल्कि उस जुझारू व्यक्तित्व की कमी पैदा हुई है, जिसने अपने संघर्ष से अनेक कलमकारों के भीतर आत्मसम्मान का दीप जलाया था।
आज भले ही गोपाल कृष्ण नायक 'देहाती' हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनका संघर्ष और उनकी बेबाक पत्रकारिता हमेशा जीवित रहेगी। खरसिया और आसपास के ग्रामीण अंचलों में पत्रकारों के स्वाभिमान की जो अलख उन्होंने जगाई, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।
किसी इंसान की असली विरासत उसकी संपत्ति या शोहरत नहीं, बल्कि उसके जाने के बाद लोगों के दिलों में बचा उसका सम्मान होता है। इस कसौटी पर गोपाल कृष्ण नायक 'देहाती' की पहचान हमेशा अमर रहेगी।
आज एक कलम खामोश हो गई है, लेकिन उस कलम से निकले शब्द और स्वाभिमान की आवाज कभी खामोश नहीं होगी।
अलविदा देहाती जी! आपने जिस नाम को अपनी पहचान बनाया, आज वही नाम ग्रामीण पत्रकारिता के सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक बन चुका है।
आपका जाना एक अपूरणीय क्षति है। आपकी स्मृतियों को विनम्र श्रद्धांजलि।
भावभीनी श्रद्धांजलि!
