


बदलता छत्तीसगढ़।रायगढ़ ब्यूरो
भूपदेवपुर का बिलासपुर जलाशय अब सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी का खुला सबूत बन चुका है। वर्षों की अनदेखी, मेंटेनेंस के नाम पर खानापूर्ति और जिम्मेदारों की चुप्पी ने मिलकर ऐसा विस्फोट किया कि गेट टूटते ही पानी नहीं, बल्कि किसानों की किस्मत बह निकली। कई एकड़ खेत जलमग्न हो गए, खड़ी फसलें बर्बादी में तब्दील हो गईं और गांवों में हाहाकार मच गया।
मामला अब सियासी अखाड़ा बन चुका है। खरसिया विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री उमेश पटेल खुद मौके पर पहुंचे और निरीक्षण के बाद सीधे हमला बोला। उन्होंने साफ कहा कि यह हादसा नहीं, बल्कि विभागीय लापरवाही और सरकारी नाकामी का जिंदा उदाहरण है। जलाशय, जिसे क्षेत्र की जीवनरेखा कहा जाता है, उसे पिछले एक दशक से मरने के लिए छोड़ दिया गया था।
उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सिंचाई व्यवस्था को यूं ही बर्बाद होने दिया गया तो आने वाले समय में और बड़े संकट खड़े होंगे। खेतों तक पानी पहुंचाने वाली यही जीवनधारा जब खुद बर्बाद हो जाए, तो किसानों का भविष्य कैसे बचेगा, यह बड़ा सवाल है।
हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डेम से लगातार दो दिनों तक पानी बेकाबू होकर बहता रहा। खेत तालाब बन गए, फसलें पूरी तरह तबाह होती रही और किसान बेबस होकर अपनी मेहनत को डूबते देखते रहे।
विधायक ने बताया कि करीब 90 प्रतिशत गेट की मरम्मत किसी तरह पूरी की गई है, लेकिन यह राहत नहीं, बल्कि सवाल खड़ा करता है कि आखिर पूरा सिस्टम इतने बड़े हादसे के बाद ही क्यों जागा। बचे हुए 10 प्रतिशत काम को तुरंत पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं।
उन्होंने सिंचाई विभाग को स्पष्ट आदेश दिए हैं कि तुरंत पानी छोड़ा जाए, ताकि जो फसलें अब भी जिंदा हैं, उन्हें बचाया जा सके। साथ ही नुकसान का आंकलन कर प्रभावित किसानों को मुआवजा दिलाने की बात भी कही गई है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी खड़ा है
क्या इस तबाही के जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी
या फिर हर बार की तरह फाइलों में दब जाएगा किसानों का दर्द
भूपदेवपुर का यह जलाशय अब सिर्फ एक ढांचा नहीं, बल्कि लापरवाही, भ्रष्ट सिस्टम और टूटते भरोसे की कहानी बन चुका है।